ऋग्वेद के 9वें मंडल का 'सोम' लंबे समय तक इतिहासकारों के लिए एक रहस्य रहा। कई लोगों ने इसे किसी नशीले पौधे या मदिरा (शराब) के रूप में देखा। लेकिन अगर यह केवल कोई नशा होता, तो ऋग्वेद का पूरा का पूरा एक मंडल (114 सूक्त) केवल इसके गुणगान में क्यों लिखा जाता?
वास्तव में, सनातन दर्शन और योग विज्ञान में 'सोम' इंसान के भीतर बहने वाली वह सर्वोच्च आनंद की ऊर्जा है, जिसे आज की न्यूरोसाइंस (Neuroscience) मस्तिष्क के 'न्यूरोकेमिकल कॉकटेल' (Neurochemical Cocktail) के रूप में पहचानती है। आइए इसे गहराई से समझते हैं।
1. सनातन दर्शन: भीतर का अमृत और निर्भयता
योग और तंत्र शास्त्रों में मस्तिष्क के ऊपरी हिस्से (सहस्रार चक्र या पीनियल ग्रंथि के पास) को 'सोम चक्र' या 'बिंदु' कहा गया है।
सोम का स्राव: ऋषियों का मानना था कि जब इंसान गहन ध्यान (Meditation), प्राणायाम या मंत्र जाप के जरिए अपने मन को पूरी तरह शांत कर लेता है, तो मस्तिष्क के इस ऊपरी हिस्से से एक रस टपकता है— जिसे 'अमृत' या 'सोम' कहा गया।
चेतना का विस्तार: यह सोम रस जब शरीर में घुलता है, तो इंसान को भूख, प्यास, डर और मृत्यु के भय से मुक्त कर देता है। ऋग्वेद (9.113) में ऋषि कहते हैं, "जहां अनंत प्रकाश है, जहां परम आनंद और उल्लास है, हे सोम! मुझे उस अमर लोक में ले चल।" यह वह स्थिति है जहां इंसान खुद को ब्रह्मांड से जुड़ा हुआ (Cosmic Connection) महसूस करता है।
2. आधुनिक विज्ञान: न्यूरोकेमिकल कॉकटेल और 'फ्लो स्टेट'
न्यूरोसाइंस के अनुसार, हमारी हर भावना के पीछे मस्तिष्क में बहने वाले रसायन (Neurotransmitters) होते हैं। जब कोई व्यक्ति गहरे ध्यान में जाता है, तो उसका मस्तिष्क अपनी सामान्य 'सर्वाइवल मोड' (तनाव और डर की स्थिति) से बाहर आ जाता है। इस अवस्था में मस्तिष्क पांच प्रमुख आनंददायक रसायनों का स्राव करता है:
डोपामाइन (Dopamine): यह फोकस और उल्लास देता है।
सेरोटोनिन (Serotonin): यह परम शांति और स्थिरता (Calmness) का अहसास कराता है।
एंडोर्फिन (Endorphins): यह शरीर के दर्द को खत्म कर देता है और एक गहरी सुखद अनुभूति देता है।
ऑक्सीटोसिन (Oxytocin): इसे 'लव हार्मोन' कहते हैं। यह इंसान को पूरी दुनिया और प्रकृति के साथ प्रेम और जुड़ाव (Oneness) का अहसास कराता है।
आनंदामाइड (Anandamide): यह सबसे रोचक है! विज्ञान ने इस रसायन की खोज की और पाया कि यह परम आनंद, परमानंद और चेतना के विस्तार की अनुभूति देता है। इसलिए वैज्ञानिकों ने इसका नाम संस्कृत के 'आनंद' (Bliss) शब्द पर ही 'आनंदामाइड' (The Bliss Molecule) रख दिया।
सनातन और न्यूरोसाइंस का तुलनात्मक उदाहरण
आइए इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझते हैं: एक योगी और एक fMRI मशीन।
मान लीजिए हिमालय की गुफा में एक योगी गहरे ध्यान में बैठा है। बाहर शून्य डिग्री तापमान है, लेकिन उसके चेहरे पर एक गहरी, स्थिर मुस्कान है। उसे न ठंड लग रही है, न भूख है, और न ही कल की कोई चिंता है। सनातन दृष्टिकोण से, उस योगी का 'सोम रस' जाग्रत हो गया है और वह ब्रह्मांडीय परमानंद का पान कर रहा है।
अब मान लीजिए कि हम उस योगी के मस्तिष्क को एक आधुनिक fMRI (Functional Magnetic Resonance Imaging) मशीन से स्कैन करते हैं। वैज्ञानिक देखेंगे कि:
उसके मस्तिष्क का वह हिस्सा शांत हो गया है जो 'मैं' या 'अहंकार' (Default Mode Network) का निर्माण करता है।
उसका मस्तिष्क आनंदामाइड और सेरोटोनिन से नहाया हुआ है।
वैज्ञानिक कहेंगे कि योगी एक चरम 'फ्लो स्टेट' (Flow State) में है। योगी कहेगा कि वह 'सोम' का पान कर रहा है। दोनों एक ही परम सत्य का वर्णन कर रहे हैं— एक भौतिक भाषा में, और दूसरा आध्यात्मिक अनुभव की भाषा में।
निष्कर्ष: हमारे वैदिक ऋषि बाहर किसी जड़ी-बूटी को नहीं खोज रहे थे, बल्कि वे अपने ही मस्तिष्क (Brain) की असीम संभावनाओं को 'हैक' कर चुके थे। ऋग्वेद का 9वां मंडल मानव चेतना को भौतिक स्तर से उठाकर उस न्यूरोलॉजिकल आनंद (Bliss) तक ले जाने की विधि है, जिसे विज्ञान आज समझने की कोशिश कर रहा है।