ऋग्वेद के 9वें मंडल का यह पहलू सबसे ज्यादा रहस्यमयी और विज्ञान के सबसे करीब है। जब हम शरीर और न्यूरोसाइंस से बाहर निकलकर पूरे ब्रह्मांड (Cosmology और Physics) के स्तर पर 'सोम' को देखते हैं, तो यह एक भौतिक तरल (liquid) नहीं, बल्कि ऊर्जा की एक अविरल तरंग (Continuous Wave of Energy) बन जाता है।
वैदिक ऋषियों ने देखा कि पूरा ब्रह्मांड खाली नहीं है, बल्कि ऊर्जा के एक महासागर से भरा हुआ है, जो लगातार एक रूप से दूसरे रूप में बह रहा है। आइए इसे सनातन दर्शन और आधुनिक भौतिकी (Physics) के सिद्धांतों के साथ गहरे उदाहरणों से समझते हैं।
1. सनातन दर्शन: अंतरिक्ष से बहती सोम की धारा
ऋग्वेद के मंत्रों में 'सोम' को अंतरिक्ष (स्वर्ग) से पृथ्वी की ओर बहने वाली एक ध्वनि और प्रकाश की लहर कहा गया है।
देवताओं का भोजन: वेदों में 'देवता' आसमान में बैठे कोई व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि प्रकृति की शक्तियां हैं— जैसे अग्नि (ऊर्जा), वायु (गैस), वरुण (जल), और सूर्य (प्रकाश)। ऋग्वेद कहता है कि यह 'सोम' ही इन सभी देवताओं का भोजन है। यानी ब्रह्मांड की हर शक्ति इसी एक मूल ऊर्जा (सोम) को पीकर जीवित है और काम कर रही है।
सोम का समुद्र: 9वें मंडल में एक बहुत सुंदर शब्द आता है— 'सोम-समुद्र'। इसका अर्थ है कि यह ब्रह्मांड खाली स्थान (Empty Space) नहीं है, बल्कि ऊर्जा का एक हिलोरें मारता हुआ सागर है।
2. आधुनिक विज्ञान: क्वांटम फील्ड और थर्मोडायनामिक्स
आज की भौतिकी भी बिल्कुल यही बात कहती है, बस उसके शब्द अलग हैं:
क्वांटम फील्ड थ्योरी (QFT): 20वीं सदी तक वैज्ञानिक मानते थे कि दो ग्रहों के बीच का अंतरिक्ष बिल्कुल खाली (Vacuum) है। लेकिन क्वांटम फिजिक्स ने साबित किया कि अंतरिक्ष कहीं भी खाली नहीं है। यह अदृश्य 'क्वांटम फील्ड्स' (Quantum Fields) से भरा हुआ है। जब इस फील्ड में हलचल या कंपन (Vibration) होता है, तो वह लहर (Wave) बन जाती है और उसी से इलेक्ट्रॉन या फोटोन (कण) पैदा होते हैं। यह फील्ड ही वेदों का 'सोम-समुद्र' है।
ऊर्जा का संरक्षण (Thermodynamics): विज्ञान का सबसे बड़ा नियम है— ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, यह केवल एक रूप से दूसरे रूप में बहती है।
3. गहराई से समझने के लिए दो वैज्ञानिक उदाहरण
आइए देखते हैं कि स्वर्ग से पृथ्वी तक बहने वाली यह 'सोम की धारा' वास्तव में कैसे काम करती है:
उदाहरण 1: एक फोटोन (प्रकाश कण) की जादुई यात्रा
कल्पना कीजिए कि सूर्य के केंद्र में न्यूक्लियर फ्यूजन (नाभिकीय संलयन) होता है। वहां से एक ऊर्जा का कण, जिसे फोटोन (Photon) कहते हैं, पैदा होता है।
स्वर्ग से प्रवाह: यह फोटोन सूर्य से निकलकर अंतरिक्ष के अंधेरे को चीरता हुआ प्रकाश की लहर के रूप में पृथ्वी की ओर बहता है (यही अंतरिक्ष से बहने वाली सोम की धारा है)।
रूप बदलना (Transformation): यह फोटोन एक सेब के पेड़ के पत्ते पर गिरता है। पेड़ प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के जरिए उस प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा (Chemical Energy) में बदल देता है। अब वह सूरज की ऊर्जा उस सेब के अंदर कैद हो गई है।
मनुष्य में प्रवेश: आप उस सेब को खाते हैं। आपका पाचन तंत्र उस सेब को पचाता है और उसे जैविक ऊर्जा (ATP) में बदल देता है।
चेतना में बदलना: वही ऊर्जा आपके मस्तिष्क की नसों में बिजली की तरंग (Electrical Impulse) बनकर दौड़ती है, और उसी ऊर्जा से आपके दिमाग में एक 'विचार' (Thought) पैदा होता है।
निष्कर्ष: जो ऊर्जा कल सूरज में जल रही थी, आज वह आपके दिमाग में एक विचार बन गई है। ऊर्जा की कोई भी कड़ी टूटी नहीं। सूर्य से लेकर आपके मस्तिष्क तक ऊर्जा का यह जो अटूट प्रवाह बह रहा है, वैदिक ऋषियों ने इसी निरंतर धारा को 'पवमान सोम' कहा है।
उदाहरण 2: स्ट्रिंग थ्योरी (String Theory) और नाद (ध्वनि)
ऋग्वेद में सोम को एक 'ध्वनि की लहर' (नाद) भी कहा गया है।
आधुनिक भौतिकी की सबसे एडवांस थ्योरी 'स्ट्रिंग थ्योरी' मानती है कि ब्रह्मांड की सबसे छोटी इकाई कोई ठोस कण (Particle) नहीं है, बल्कि ऊर्जा के छल्ले हैं जो रबर बैंड की तरह कांप रहे हैं (Vibrating Strings)। इन स्ट्रिंग्स के अलग-अलग कंपन (Frequency) से ही अलग-अलग तत्व बनते हैं। जैसे गिटार के तार को अलग-अलग छेड़ने से अलग धुन निकलती है, वैसे ही ब्रह्मांड की इस ऊर्जा के कंपन से सृष्टि बनी है। ऋषियों ने इसी ब्रह्मांडीय कंपन को 'सोम की ध्वनि' या 'ओम' (ॐ) का नाद कहा था।
अंतिम सत्य: ऋग्वेद का 9वां मंडल हमें बताता है कि हम इस ब्रह्मांड से अलग नहीं हैं। जो ऊर्जा तारों को जला रही है, वही ऊर्जा हमारे दिल को धड़का रही है। हम सब ऊर्जा के उसी एक महासागर की छोटी-छोटी लहरें हैं।