श्लोक:
धन्न्यो रक्तवाहिन्यश्चतुर्विंशतिरीरिताः।
कुल्याभिरिव केदारस्ताभिर्देहोऽभिवर्धनते।।
(संगीतरत्नाकर 2.105–106)
भावार्थ (वैज्ञानिक रूप में):
यह श्लोक कहता है कि शरीर में 24 रक्तवाहिनियाँ (धमनियाँ) हैं जो रक्त को पूरे शरीर में पहुँचाती हैं, जिससे शरीर पोषित होकर बढ़ता है —
जैसे खेतों में नहरें जल पहुँचाती हैं, वैसे ही धमनियाँ रक्त पहुँचाती हैं।
🕉️ शास्त्रीय प्रमाण (Shloka Evidence)
📜 प्रमाण १ — छांदोग्य उपनिषद् (८.६.६)
अस्य ह वा एष हृदयस्य शीर्षतः शतानि तस्य नाड्यः सहस्राण्येकं तासां शतं शतं प्रत्येकं शतं शतानि। तास्वेकया नाड्या उर्ध्वमायत्युत्तमं पुरुषं विदधाति।
(छांदोग्य उपनिषद् 8.6.6)
भावार्थ:
इस हृदय से अनेक नाड़ियाँ निकलती हैं — प्रत्येक दिशा में सैकड़ों, और उन सैकड़ों में पुनः सैकड़ों शाखाएँ निकलती हैं।
एक प्रमुख नाड़ी ऊपर (ब्रह्मरंध्र) की ओर जाती है, जिससे ज्ञानी पुरुष मोक्ष को प्राप्त करता है।
👉 इस श्लोक में नाड़ियों की असंख्यता बताई गई है — संख्या का प्रतीकात्मक वर्णन है।
📜 प्रमाण २ — शाण्डिल्योपनिषद् (१.३)
हृदयकमले सहस्रदलस्थाने सूक्ष्मा नाड्यः सप्तदशसहस्राणि भवन्ति। तासां मूलं हृदयमेव।
भावार्थ:
हृदय में स्थित सूक्ष्म नाड़ियों की संख्या 72,000 (सप्ततिसहस्र) कही गई है।
सभी नाड़ियों का मूलस्थान हृदय है।
👉 यह वही स्थान है जहाँ से शरीर में प्राणशक्ति (vital energy) का प्रवाह होता है।
📜 प्रमाण ३ — योगशिखोपनिषद् (अध्याय १, श्लोक ६-८)
हृदयं तु महत् स्थानं नाडीभ्यः संप्रवर्तते।
तासां संख्या तु विज्ञेया द्वासप्ततिसहस्रकम्।।
भावार्थ:
हृदय से नाड़ियाँ निकलती हैं जिनकी संख्या 72,000 बताई गई है।