वे ऋतुएँ जब धूमकेतु पृथ्वी को प्रभावित करते हैं

 तेषां विद्युतसम्मोहस्तु शरद्वासन्तयोः क्रमः। भवन्त्यादित्यकिरणे- श्वान्तर्भूताः स्वभावतः।।
Brihad-vimana-shastram, Kriyasara-tantram page 185


शरद ऋतु और वसंत ऋतु में इन धूमकेतुओं का प्रभाव तेजी से बढ़ जाता है, क्योंकि ये प्राकृतिक रूप से सौर किरणों में विद्यमान रहते हैं।


धूमकेतु छोटे-छोटे खगोलीय पिंड होते हैं जो धूल, बर्फ और गैसों से बने होते हैं। ये सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार कक्षाओं में घूमते हैं। जब कोई धूमकेतु सूर्य के करीब आता है, तो उसकी बर्फ पिघलने लगती है और गैसें निकलने लगती हैं। ये गैसें और धूल मिलकर एक लंबी पूंछ बनाती हैं जो सूर्य के विपरीत दिशा में फैली होती है। इस पूंछ की वजह से धूमकेतु अक्सर पुच्छल तारे के नाम से भी जाने जाते हैं।


Previous Next

نموذج الاتصال